Dr Harisuman Bisht. Hindi Writer

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बदलती रंगत के बीच उभरते उदास रंग

मीनाक्षी जोशी

आज भौतिकवादी सोच के साम्राज्य की परिधि में समाज की परिवर्तित जीवन-शैली ने न जाने कितनी-कितनी समस्याओं और घटनाओं को जन्म दिया है। क्या सभ्यता का संक्रांतिकाल कहकर हम आए दिन होने वाली घटनाओं की उपेक्षा कर सकते है? वर्तमान जीवंत समाज की संरचना में उगते जा रहे तमाम बाधाओं के जाल को बड़ी गहराई और निर्भीकता से विश्लेषित करने की आवश्यकता है और यह तभी संभव है जब हम सत्य को सत्य स्वीकार करें परंतु स्वीकार करने से पहले उसे पूर्ण रूप से समझना भी जरूरी है।

सुपरिचित कथाकार हरिसुमन विष्ट का नव्यतम उपन्यास “ बसेरा” अपने साथ आरंभ से ही एक नई कथा-सिहरन लेकर उपस्थित हुआ है। कथानक बहुचर्चित “ निठारी-हत्याकांड” की पृष्ठभूमि पर आधारित है जिस पर बहुत कम रचनाकारों की कलम चली है।

      उपन्यास में राजधानी दिल्ली से लगे इस इलाके के विषय में गहरी सहानुभूति से शुरू हुए विवरणों से क्रमशः इलाके की बदलती तस्वीर कुछ इस तरह से सामने आती हैं कि पाठक बंधता चला जाता है । सदियों से इत्मीनान से निठारी में रहते चले आये लोगों की नई पीढ़ी ने कैसे एक नया समय देखा और देखते-देखते पास ही बसती चली गई एक पॉश बस्ती । उपन्यास का आरंभ ही इतना रोचक है कि अनायास निरंतर पढ़ते चले जाने की जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है । देखिये शुरुआत – “ ‘कुंभीपाक डॉटकॉम’... माफ करें जिस्म-चोर ‘जी मेल सर्विस’ का यह सेक्टर और ठिकाना बदल चुका है। पाठकवृन्द अब नए पते पर संपर्क करें । अच्छा, आप इसे निठारी की नालियों में खोज रहें हैं । चले आइये, बेबस-विस्थापित आत्माओं का यही जाना-पहचाना, नामचीन नया इलाका है। यह भी मॉल कल्चर की उपज है। उसकी बदबूदार सुरंग का मुहाना और मेनहोल यहीं खुलता है। इसके शीशाई सब-वे में कारखानेदार, मालदार, अलम्बरदार, और सिफारिशी-ऊंची पहुंचवाले जिन्न रहते हैं। उनके ही जैसे पैने दांतोंवाले पिशाच उनकी चाकरी में गश्त लगाते हैं। यहाँ के बेनाम हवामहल, बंगले, कोठियाँ सेक्टर-दर-सेक्टर मेनहोल की चीख़ों से लबरेज है। दोपाये वालों की चीख़ों से और स्वाद से भी लबरेज है।“

      गाँव के बीच में ब्राह्मणों, गुर्जरों और मुसलमानों के परिवार रहते थे। उनकी रगों में खुशी, पीड़ा और मानवीय सम्बन्धों की हमेशा एक-सी धारा बहती थी। इंसानियत की मिसाल था निठारी गाँव। 1971 के युद्ध के बाद उ प्र, बिहार, बंगला देश से आये शरणार्थियों गाँव के बाहर झोपड़ियाँ बना कर रहने लगे। गाँव वालो ने उन गरीबो को भी अपना लिया था। किन्तु धीरे-धीरे उन शरणार्थियों ने उनकी जमीन पर कब्जा कर सेक्टर बना लिए। सेक्टर में बसे लोगों का जीवन तेजी से विकसित होने लगा और गाँव पिछड़े समाज का उदाहरण। सेक्टर-दर-सेक्टर ‘नोएडा’ बसने लगा। इसके साथ ही शुरू होता है एक त्रिकोण की रचना अर्थात नेता, नागरिक और पुलिस । दूसरे शब्दों में इसे यदि अपराध, कारण और परिणाम कहूँ तो अनुचित न होगा। निठारी तथा सेक्टर के बीच एक दीवार चिनवा दी गई। यहाँ पर लेखक की व्यंग्यात्मकता उल्लेखनीय है। वे लिखते है कि गाँव और शहर के बीच दीवार खड़ी करने का काम सरकार हमेशा करती आ रही थी।... गाँव और शहर के बीच दूरी न रखी तो निठारी को एक पुराना गाँव मानकर हेरीटेज की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता था।... गाँव की अपेक्षा शहर प्राधिकरण के लिए दुधारू गाय के लिए खूंटा गाड़ने जैसा था, जिसे किसी भी वक्त पगुराकर दुहा जा सकता था। गाँव और शहर के बीच लोकतंत्र की सड़क बना दी गई।

       कथानक में प्रमुख पात्रों के नाम के स्थान पर ‘वह आदमी’ और ‘वह औरत’ का प्रयोग किया गया है। एक विचित्र संयोग का बड़ा ही मनोवैज्ञानिक चित्रण बिष्ट जी के कला-लेखन का परिचय देती है- “सुनामी का आना और औरत का घर छोड़कर जाना”। सुनामी को आए महिना भर हो चुका है। उस औरत को गए भी। सुनामी से तबाही का आकलन अभी हुआ नहीं था। दोनों के लौटने की उम्मीद थी- एक से तबाही में शोक, तो दूसरे के घर लौटने पर खुशी… जिस दिन औरत घर से गई, टी वी पर सुनामी के लौटने तथा उससे हुई जान-माल की भारी तबाही और नुकसान की खबर प्रमुखता से दोहराई जा रही थी। दूर-दूर तक फैला समुद्र गोया औरत के लिए फैली दुनिया का अहसास दे रहा था... आनंद भी है वहाँ रसातल भी, जो भीतर है वो बाहर आने की धुन में खोये हैं और जो बाहर है, वें भीतर की दुनिया में खोये हैं। आखिर विचलित मन का ठहराव कहाँ किस बिन्दु पर टिका है कोई नहीं जानता... औरत की भांति मन नहीं होता आदमी का- चंचल-एकदम बहता पानी-सा। आदमी का मन उस चट्टान की मानिंद होता है, जिस पर सुनामी के थपेड़े हमेशा पड़ते रहते है”


       आजकल भोगवादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली संस्कृति में जब लोग देखते है कि बड़े-बड़े अपराधियों पर कोई कार्यवाही नहीं होती तो फिर अपने आकाओं द्वारा बचा लेने की अपेक्षा में अपराध करने वालों की संख्या बढ़ जाती है। पहले समाज तथा परिवार अपराधी-वृत्ति पर नियंत्रण रखते थे किन्तु व्यक्तिवादी प्रवृत्ति बढ़ने के बाद यह काम शासन या पुलिस का माना जाता है। माता-पिता अपने कामों में इतने व्यस्त हैं कि उन्हें अपने बच्चों की देख-भाल करने का समय ही नहीं मिलता फिर चाहे वह किसी भी वर्ग के हों। जब कानून पालन की बात आती है तो अपराधिक न्यायिक व्यवस्था का पहला चरण ‘पुलिस’ के विषय में चर्चा आवश्यक हो जाती है। कथाकार ने इस संदर्भ में बहुत ही सटीक विश्लेषण किया है। ‘बसेरा’ में गीता और जदो सरकार के बच्चे गुम होने पर उसे पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने और उनकी मदद लेने की सलाह दी जाती है तब जदो सरकार का जवाब यहाँ उल्लेखनीय है। वह कहता है-


       “ क्या मदद करेगी साहेब! वह हमें एकमुश्त खा जाये तो मुक्ति मिल जाती। फिर ऐसी बात तो सुनने को नहीं मिलती- औलाद को पाल-पोस नहीं सकते, देख-भाल नहीं कर सकते तो पैदा करते ही क्यों हो ? ... लोग क्या बच्चों को बिजनेस करने को पैदा करते हैं?”

अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार कन्वेन्शन में सहयोगी होने के बावजूद आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी मनुष्य की इज्जत को भारतीय दंड संहिता नहीं मानता। विडम्बना यह है कि देश में पुलिस की किसी भी कार्यवाही पर न्यायालय द्वारा विश्वास ही नहीं किया जाता। लेखक ने

यहाँ पुलिस की कार्यप्रणाली में एक बहुत बड़े दोष को उजागर करने का साहस किया है कि वे केवल शिकायतकर्ता के पक्ष को ही सुनते है जबकि पुलिस अधिनियम में प्रावधान है कि अभियुक्त का स्पष्टीकरण लेकर उन तथ्यों का भी सत्यापन करने के बाद ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। इस उपन्यास में इतिहास कि महत्ता पर भी सटीक चर्चा हुई है। नेताओं पर बच्चों द्वारा किया गया व्यंग्य गहरे यथार्थ को प्रस्तुत करता है- “ टीचर कह रही थी, सबकी भाषा ठीक की जा सकती है- व्याकरण, लिंग भेद सब कुछ ठीक किया जा सकता है, किन्तु नेताओं की भाषा कभी ठीक नहीं हो सकती... क्योंकि वे हमेशा उन सपनों को बताते है, जिन्हें वे भूल चुके होते है।“


       रक्तदान के बहाने डॉक्टरों ने गरीब अजित सरकार की किडनी ही गायब कर दी। परिणाम अजित की असामयिक मृत्यु। स्पष्ट है कि तकनीक के अपने उद्देश्य खराब नहीं होते , निर्भर करता है कि उसका उपयोग क्यों और कैसे किया जा रहा है। यदि अपराधीवृत्ति के लोग उसका दुरुपयोग कर रहे है तो सवाल यह उठता है कि उन अपराधों को नियंत्रित करने के लिए हम क्या कोशिशें कर रहे हैं ? वर्तमान समाज में अपराधों की बाढ़ सी आई हुई है। व्यस्त लोगों की विवशताएँ हैं और जीवन से विलग होती संवेदनायें , व्यवस्था से उठता विश्वास तथा हैरान होते लोगों की परेशानियाँ, उभरता आक्रोश आदि का चित्रण सहज-सरल रुप में हुआ है। मुस्तफा जैसे शख्स की बेचैनी भयातुर आम आदमी की बेचैनी है और इन सबके बीच रहस्य बंधी कथा। जीवन है और है उसका कंट्रास्ट।


       निठारी हत्याकांड जैसा वीभत्स अपराध समस्त उदाहरणों का चरम है। कथानक में और अधिक कसाव लाया जा सकता था। मुख्य घटना से संबन्धित कुछ अन्य पात्रों और घटनाओं का अनावश्यक विस्तार कहीं-कहीं नीरसता उत्पन्न करती है। फिर भी गीता और जदो सरकार जैसे चरित्र, जशोदा की कामना हो या निठारी कांड का सच, खोजी कथाकार की तरह हरीसुमन बिष्ट अपने समय की कठोर सच्चाई की परतें उघाड़ने में पूर्णतः सफल हुए हैं। इस उपन्यास में उनका कथाकार एक नए रूप में खुलकर सामने आता है जो अपने समय की समीक्षा इस उपन्यास के माध्यम से करता है। समकालीन यथार्थ से मुठभेड़ ही ‘बसेरा’ की महत्ता और प्रासंगिकता को रेखांकित करती है। निसंदेह पुस्तक सबके लिए पठनीय एवं संग्रहणीय भी है।