Dr Harisuman Bisht. Hindi Writer

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अकेलेपन से जूझने की विडम्बना | सुषमा जुगरान ध्यानी | Book Review

मौजूदा दौर की सबसे बड़ी त्रासदी और विरोधाभास अगर कुछ है तो यही कि चारों ओर मनुष्यों की बढ़ती भीड़ के बावजूद हर कोई अपने भीतर के एकाकीपन से बेतहाशा जूझ रहा है। खासकर उम्र के उत्तरार्ध में जी रही बुजुर्ग पीढ़ी तो अपने ही घर-परिवार और समाज के बीच किसी अजनबी की मानिंद ट्रीट होने के लिए शापित होती चली जा रही है। चाहे महानगर हों या छोटे शहर कस्बे या कि गांव-देहात, हर जगह इंसान जिंदगी के बियावान में अपने भीतर एक अव्यक्त अकेलापन ढोते हुए जीने के लिए अभिशप्त है और उसी में अपने होने न होने की राह तलाश रहा है। इस संघर्ष में जहां उसे एक पल को अपने जीने की राह सुगम दिखाई देती है, वहीं दूसरे क्षण अपने ही अंदर मौजूद निराशा का घटाटोप भटकाकर जीवन के उद्देश्य से दूर करने का षडयंत्र रचने लगता है।


ऐसी स्थिति में वर्तमान के कड़ुवे घूंट पीते हुए वह अपने स्वर्णिम अतीत को भुलाये नहीं भूल पाता है। इस क्रम में ‘भीतर कई एकांत’ का बूढ़ा एक साथ कई भाव भूमियों पर अवस्थित दिखता है। कहीं वह उच्च कोटि का दार्शनिक और चिंतक भाव लिए नैरेटर से वाद-विवाद करते हुए उसे बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है, तो कई मौकों पर चतुर राजनीतिज्ञ की तरह खेल खेलता नजर आता है।


इससे अलग कई बार वह समाज द्वारा तिरस्कृत निरीह और लाचार बूढ़े की शक्ल में अपने बाहर और भीतर के अकेलेपन से भिड़ता रहता है। लेकिन इस बहुरुपिए का रहस्यात्मक, दार्शनिक और चिंतक रूप ही बाकी रूपों पर भारी है, कदाचित इसीलिए नैरेटर न चाहते हुए भी उसकी ओर खिंचा चला आता है और कई बार चले जाने के लिए तैयार होते हुए भी सारी रात उसकी गुमटी में बिता देता है।


समकालीन गल्प शिल्प के जाने-पहचाने हस्ताक्षर डॉ. हरिसुमन बिष्ट का हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘भीतर कई एकांत’ का सार संक्षेप यही है। एपीएन पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित आलोच्य उपन्यास जीवन के उत्तरार्ध में एकाकी जीवन जी रहे एक ऐसे वृद्ध का आख्यान और अंतर्द्वद्व है जो प्रकारांतर से पूरे बूढ़े समाज का आख्यान और अंतर्द्वद्व बन जाता है। इस अर्थ में ‘भीतर कई एकांत’ का बूढ़ा विश्वमोहन उस पूरे वृद्ध समाज का प्रतिनिधि है जो घर-परिवार से लेकर देश-समाज तक एकाकी जीवन जीने के लिए शापित हो चला है। आज ऐसे उपेक्षित बुजुर्ग चाहते हुए भी अपने घर परिवार या समाज को अपनी भावनाओं से आत्मसात नहीं करवा पा रहे हैं जबकि उनके अंदर समाज को दिशा देने का भरपूर

माद्दा और हुनर मौजूद होता है।


संवादात्मक शैली में रचे गए आलोच्य उपन्यास में बेशक बूढ़े विश्वमोहन का अंतर्द्वद्व और एकालाप ही सबसे बड़ा स्पेस पाता है, लेकिन नैरेटर और बूढ़े के बीच के संवाद में एक सांगोपांग समाज का चित्र भी बराबर खिंचता चला जाता है, जहां समाज और संस्कृति के साथ ही प्रकृति-पर्यावरण से लेकर धर्म दर्शन और आध्यात्मिक चेतना का विस्तृत वितान तना हुआ नजर आता है और जहां मनुष्य आशा- निराशा के भंवर में तैरता नजर आता है।


उपन्यास का आरंभ ही प्रकृति राग और श्रीमद्भगवद गीता के तत्वज्ञान के साथ शुरू होता है जहां नैरेटर सुबह-सुबह बांज-बुरांश और देवदारु की खपच्चियों से छाई हुई गुमटी में बैठे उस कथानायक बूढ़े का परिचय कराता दिखता है जो पास ही बरगद और पीपल के झड़ते पत्तों को जमा करते हुए स्वयं को 84 लाख योनियों के महाकुंड में तैरता महसूस करता है। पेड़ से गिरे पत्ते को वह देह से मुक्त आत्मा का प्रतीक मानता है। पूरे उपन्यास में बूढ़ा कहीं गीता के कृष्ण की तर्ज पर कर्म का ज्ञान देता दिखता है तो कहीं अथाह संघर्षों के बाद मिली आजादी के बाद के

भारत की दुर्दशा पर आक्रोश जताते हुए व्यथित होता है।


उपन्यास की भूमिका में कवि आलोचक प्रताप सिंह ने ‘भीतर कई एकांत’ के बूढ़े विश्वमोहन की तुलना अमेरिका के नोबेल पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ के लाचार बूढ़े से उपयुक्त ही की है। हेमिंग्वे के ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ का बूढ़ा नायक जीवन की अदम्य इच्छा की प्रतीक एक अदद मछली के लिए सारा दिन भूखा-प्यासा समुद्र के बीच गुजार देता है और कुछ हासिल नहीं कर पाता है। ‘भीतर कई एकांत’ का विश्वमोहन भी गांव से अलग-थलग अपनी गुमटी में 65 साल पुराने अतीत की याद में वर्तमान

विषम परिस्थितियों से अकेले जूझ रहा है और कुछ सार्थक नहीं कर पा रहा है। हालांकि कथा के अंत में बूढ़ी औरत की आवाज और गांव के बच्चों का उसकी राह तकना इस बात का प्रतीक है कि आशा की एक किरण अभी कहीं उसके मन में शेष है। कदाचित इसीलिए वह तेजी से गांव की पगडंडी पर आगे बढ़ने लगता है।


आज जबकि साहित्य में पाठकों की संख्या कम से कमतर होती जा रही है, किसी कृति की सफलता के लिए कहानी या उपन्यासकार का दो बिंदुओं पर फोकस बेहद जरूरी हो जाता है- पहला कृति का शीर्षक और दूसरा उसका आकार। पाठक को रचना का शार्षक रास आ जाए, साथ ही उसके भारी भरकम होने का डर न हो तो किताब हाथ में आते ही वह कथानक के भीतर प्रवेश करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। कह सकते हैं कि किसी औपन्यासिक कलेवर को रोचक शीर्षक के साथ कम से कम शब्दों में समेटने की कला जिस कथाशिल्पी को आती हो, वही मौजूदा दौर में सफलता के पायदान पर आगे बढ़ने का माद्दा रखता है।


‘भीतर कई एकांत’ की इस परिप्रेक्ष्य में विवेचना की जाए तो मात्र 87 पृष्ठों में समाहित यह उपन्यास न सिर्फ अपने रोचक शीर्षक के चलते पाठक को अपनी ओर खींच ले जाता है, बल्कि सीमित शब्दों में दशकों के कालखंड के सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक परिवेश के साथ ही भारतीय धर्म-दर्शन का एक सुगुंफित विचार भी पाठक के सामने परोस देता है। मात्र दो पात्रों के माध्यम से नई और पुरानी पीढ़ियों के अंतर को भी बेबाकी से उकेरने का उपन्यासकार का प्रयास सार्थक सिद्ध होता है।


कह सकते हैं कि सीमित पात्र और लघु आकार के बावजूद आलोच्य कृति एक समग्र उपन्यास की सभी अर्हताएं पूरा कर जाती है। बल्कि इससे ऊपर यह इस मौलिक सोच के साथ भविष्य के कथाकारों के लिए एक नमूना बन जाती है कि आज जबकि भारी-भरकम उपन्यासों का समय चुकता जा रहा है, उपन्यास विधा को बड़ी कहानी और वृहद उपन्यास के बीच के आकार में लोकप्रिय बनाया जा सकता है।


कृति- भीतर कई एकांत (उपन्यास)

लेखक- डॉ. हरिसुमन बिष्ट

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