Dr Harisuman Bisht. Hindi Writer

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Book Review | Basera

‘बसेरा’ में बसेरा नहीं है | प्रेम जनमेजय | Basera

हरिसुमन बिष्ट की रचनाओं को पढ़ने के लिए मुझे अतिरिक्त साहस जुटाना पढ़ता है। इनकी अधिकांश रचनाएं आपसे एक ओर पूरी सहभागिता की अपेक्षा करती हैं तो दूसरी ओर आपको कथारस के साथ बेचैन भी करती हैं। वे चाहे इनके उपन्यास ‘ आसमान झुक रहा है’ ‘होना पहाड़’ ‘आछरी माछरी’ आदि हों अथवा उनकी कहानियां। मुझे याद है जब मैंने उनकी कहानी ‘हवाघर’ पढ़ी थी तो काफी दिन तक उनका जंग बहादुर मेरे साथ रहा और मुझे बेचैन भी करता रहा। उसके द्वारा उठाए गए सवाल मुझे निंरतर बेचैन करते रहे। जंग बहादुर वैसे तो अनेक सवाल करता है पर उसका यह सवाल -‘‘तो तुम ही बता देगा साब, अपना देश कहां है-यहां या वहां?’ बेचैन तो करता ही साथ ही एक वाक्य में अनेक व्याख्याएं प्रस्तुत कर देता है। और उसका यह सवाल-क्या इन बादलों के अच्छा लगने से मन ठीक होगा, पेट भर जाएगा, मेरा पेट भर जाएगा ? जंग बहादुर का बच्चा इससे कम सुंदर है क्या?’’


अपने प्रिय कथाकार हरिसुमन बिष्ट का उपन्यास ‘बसेरा’ पढ़ने के लिए दो बार उठाया, फिर छोड़ दिया। पर अधिक समय तक इसे छोड़ नहीं पाया। एक ओर तो यह दबाव कि देखें इस बार किस सामाजिक यथार्थ से हरिसुमन बिष्ट मेरा परिचय करवाते हैं और दूसरी ओर उनके उपन्यास पर आयोजित गोष्ठी में अपनी बात कहने का दिन समीप आ रहा था। इस संगोष्ठी में हमारे समय के श्रेष्ठ कथाकर एवं ‘हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव की महत्वपूर्ण उपस्थिति में मुझ अज्ञानी को अपनी बात कहनी थी। मैं किसी भी कृति को पढ़ तो अच्छी तरह लेता हूं पर जब उसपर कुछ कहने का आदेश होता है तो अपनी सिट्टी-पिट्टी गुम होने लगती है। और जिस गोष्ठी में राजेंद्र यादव जैसे रचनाकार हों उसमें सिट्टी-पिट्टी के साथ और भी बहुत कुछ गुम होने लगता है। मैं उस छात्र सा हो जाता हूं जिसे उस विषय की परीक्षा की तैयारी करनी है जो उसके लिए सबसे कठिन विषय है। दूसरे यदि कृति हरिसुमन बिष्ट जैसे सजग रचनाकार की हो तो ...।


Basera | Book Review


‘बसेरा’ को पढ़ना आरंभ किया तो पहले अनुच्छेद ने मेरे अंदर एक साहस भर दिया। एक बेचैनी के  ‘आतंक ’ के कारण इसे पढ़ने का साहस नहीं कर रहा था पर आरंभ ने मुझसे मेरी ही शैली में सवंाद किया। आप भी इस आरंभ को देखें-‘‘कुभीपाक डाॅटकाम...माफ करें जिस्म-चोर ‘जी मेल सर्विस’ का यह सेक्टर और ठिकाना बदल चुका है। पाठकवृंद, अब नए पते पर संपर्क करें। अच्छा, आप इसे निठारी की नालियों में खोज रहे हैं। चले आइए, बेबस -विस्थापित आत्माओं का यही जाना-पहचाना, नामचीन इलाका है। यह भी माॅल क्लचर की ही उपज है। उसकी बदबूदार सुरंग का मुहाना और मैनहोल यहीं खुलता है ! इसके शीशाई सब -वे में कारखानेदार, मालदार, अलंबरदार और सिफारिशी - उंची पहुंच वाले जिन रहते हैं। उनके ही जैसे पैने दांतोवाले पिशाच उनकी चाकरी में यहां गश्त लगाते हैं। यहां के बेनाम हवामहल, बंगले कोठियां सेक्टर-दर- सेक्टर मैनहोल की चीखों से लबरेज हैं। दोपायेवालों की चीखों से और स्वाद से लबरेज।’’ इस उद्धरण से आपको स्पष्ट हो गया होगा कि लेखक अपनी आदत से बाज नहीं आयया है, बस उसने शैली बदल दी है। वह बचैनी की एक के बाद एक परत उपस्थित कर रहा है। यह बेचैनी आपको अवसाद में नहीं ले जाएगी अपितु आपमें विसंगितयों के विरुद्ध आक्रोश भरेंगी। यह शैली मजा आ गया कि शैली नहीं है अपितु आपको सावधानीपूर्वक पढ़ने के लिए बाध्य करती है तथा आपकी अंतरात्मा को, यदि वह है तो, कुरेदते हुए चलती है। इसे मैं व्यंग्य उपन्यास तो नहीं कहूंगा परंतु इतना कहूंगा कि एक अच्छे व्यंग्य उपन्यास के कुछ मानदण्ड अवश्य उपस्थित करता है। ‘बसेरा’ का मूल कथ्य हमारे आसपास बिखरी विसंगतियों से साक्षात्कार करवाना है। इसलिए प्रसंगानुसार जब भी अवसर मिला है हरिसुमन बिष्ट ने व्यंग्य के हथियार का सार्थक प्रयोग किया है। एक बड़ी व्यंग्यात्मक रचना में क्षेपकों का बहुत महत्व होता है। इन क्षेपकों के माध्यम से रचनाकार कभी भी उपस्थित होकर एक घटना अथवा परिस्थिति के माध्यम से अन्य विसंगतियों पर भी प्रहार करने का सुअवसर जुटा लेता है। जैसे हरिसुमन बिष्ट गांव की नागरिकता की चर्चा करते -करते राजनीतिज्ञों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हैं-राजनीतिक व्यक्ति की भाषा को कोई व्याकारण अभी तक तैयार नही हुआ था। वह जो कहते , वह होता नहीं था और जो होता , वह वाक्य उनकी जुबान से छूटता नहीं था।... गांव और शहर के बीच दीवार खड़ी करने का काम सरकार हमेशा करती आ रही थी।’’ उनका यह कथन मुझे ‘राग दरबारी’ के आरंभ में ट्रक और सड़क को लेकर की गई रचनात्मक टिप्पणी याद हो आती है-- गांव और सेक्टर के बीच लोकतंत्र की एक सड़क बना दी गई थी। यह साधारण सड़क नहीं थी, बल्कि दो दुनिया की नो-मैंस लैंड थी, जिस पर भैंसागाड़ी, रेहड़ा, हाथगाड़ी, रिक्शा के साथ मर्सीडिज कार तक चलने लगी। मर्सीडिज हवा में उड़ना चाहती तो भैंसागाड़ी उस पर ब्रेक  लगा देती।’’ 


हरिसुमन बिष्ट ने इस उपन्यास में अपने व्यंग्य प्रवृति को अभिव्यक्ति का खुला मैदान प्रदान किया है। ‘गोबरेन’ जैसे शब्दों का प्रयोग उनकी तीव्र एवं प्रखर प्रवृति को ही इंगित करता है। हरिसुमन बिष्ट प्रसंग के अनुकूल भाषा में परिवर्तन लाते हैं। अनेक स्थलों पर व्यंग्य के हथियार से लैस उनकी भाषा प्रतीकों एवं बिम्बों के प्रयोग से काव्यात्मक हो जाती है। उपन्यास के आंरभ में जहां उनकी शैली व्यंग्यात्मक एवं विसंगतियों को लक्षित करने वाली है वहीं उपन्यास के मध्य में जाकर वह काव्यात्मक भी हो जाती है। किसी घटना की भूमिका अथवा चरित्र के चित्रण के लिए वे पूर्व में ही परिवेश चित्रण के माध्यम से एक भूमिका तैयार कर देते हैं। पाठक की एक मानसिकता बना देते हैं। ऐसा वे इस चतुराई से करते हैं कि वर्णन के प्रभाव में पाठक इस परकाया प्रवेश को सहज ही भोग लेता है। उसे आभास भी नहीं होता है और वह एक भावनाओं की खूबसूरत लहरों में बहने लगता है। आपने उपन्यास के आरंभ में उनकी व्यंग्यात्मक वर्णन शैली के दर्शन किए और अब उपन्यास के मध्य में व्यक्त उनकी काव्य प्रतिभा के दर्शन कीजिए।‘‘ उंची इमारतों की छतों पर धूप खेलने लगी। झोपडि़यों को उसका नीचे उतरने का इंतजार था। इंतजार था कि गंदे कीड़े, जो रात के अंधेरे में नाला छोड़कर उनकी झोपडि़यों में घुस आए थे। मुस्तफा के प्राण जो सुबह की ठंड और ओस के डर से कंठ पर अटके हुए थे, वे अपनी ठौर पर चले जाएं।’’

यह उपन्यास हमारी दिनोदिन मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं से शून्य होती जा रही तथा सम्पन्न वर्ग के लिए ही निर्मित होती जा रही व्यवस्था पर हमारा ध्यान आकार्षित करता है।‘बसेरा’ हमारा ध्यान समाज में धनाढ्य वर्ग द्वारा चलाए जा रहे उन षड़यंत्रों की ओर स्पष्ट संकेत करता है जिसके चलते समस्त सुख-सुविधाएं , न्याय प्रक्रियाएं, संस्थान आदि एक ही वर्ग के ‘उपभोग’ के साधन बनकर रह गए हैं। कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है, अमीर-गरीब सबको समान अधिकार हैं परंतु पैसे की ताकत से सब कुछ खरीदा जा सकता है जैसे सामाजिक सत्य के समाने वंचितों स्वयं को विवश पाते हैं। धनबल एवं उसके द्वारा क्रय किए गए भुजबल आदि के समक्ष वंचित निसहाय है। न्याय प्रक्रिया को इतना खर्चीला एवं सुस्त बना दिया है कि न्याय पाने के लिए न्यायालय में जाने से आमजन घबराता है। जिनके पास वंचित रक्षा के लिए जाता है वे उससे भक्षक का व्यवहार करते हैं। उनकी दृष्टि उसे भयभीत करती है इसलिए उसे लगता है कि वह मांगने तो न्याय जाएगा पर उसे झेलना अन्याय पड़ेगा। थाना वंचितों के लिए प्रतिबंघित क्षेत्र-सा है। थानेदार में बैठा शेर मोटी थेलियों को देखकर दुम हिलाता है एवं  सरकस का शेर बन जाता है। धन के प्रभाव ने सारे नैतिक मानदंड ध्वस्त कर दिए हैं। ऐसे बहुत सारे सवाल हरिसुमन बिष्ट ने इस उपन्यास में उठाए हैं जो सजग पाठक को बेचैन करते हैं। इन सारे सवालों से घिरा रचनाकार स्वयं भी परेशान है। पात्र के मुंह से उसकी बेचैनी बोलती है। उपन्यास के अंत में आलोकी से किए महेंद्र के सवाल ‘नैतिक’ पाठकों के समक्ष उछाले गए सवाल हैं। 


महेंद्र कहता है-

‘‘ ... मगर तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।’’ 

‘क्यों नहीं ? तुम सोचते हो भूखी मर जाउं मैं ।’’

‘‘ऐसा काम करने से तो मरना अच्छा है।’’


‘‘ नहीं, ऐसा न कहो महेंद्र ! आज के समय में कुछ भी गंुनाह नहीं। ये मेरे भूखे पेट का सवाल है।’’ वह गिड़गिड़ाती हुई बोली ,‘‘ मैं इससे कैसे अलग रहूं महेंद्र! ये मेरी रोटियां हैं, रोटियां। पेट भरने के लिए रोटियां। बहुत रुपया दिया है साहब ने। उनके अहसानों को कैसे चुका सकती हूं भला मैं।’’ 


इस सवाल के उत्तर में सवाल हो सकता है कि वेश्यावृत्ति के लिए यह कुतर्क क्यों।पर भूखे पेट से उठे रोटियों के सवाल से महेंद्र भी व्याकुल हो सकता है। पर यही आलोकी, किसी के निर्मम हवस का शिकार  बनी क्षत-विक्षत ‘अपने’ के नर्सिंग होम में मामले को रफा-दफा करने के इरादे से भरती की जाती है। और तब महेंद्र--‘‘ बात खत्म हो गई, ऐसा अनुमान महेंद्र ने डाक्टर के हावभाव से लगा लिया था। अब आलोकी बचे या नहीं , उसके इलाज का रुपया डाॅक्टर माधुरी को दे दिया।उससे अब कोई सरोकार नहीं रह गया था, इन्सानियत का सरोकार तो कभी नहीं। जबसे उसके शरीर की कीमत उसने लगवा दी और वह उसका समय-समय पर भुगतान भी कर रहा था। उस आदमी के लिए औरत की कीमत कोई ज्यादा नहीं थी, वह कभी भी कितनी थोक में खरीद सकता था, आज वह किसी कुतिया को एक टुकड़ा रोटी का देता तो दूसरे दिन वह स्वयं जूठी रोटी के लालच में चली जाती।’’ उपभोक्तावदी संस्कृति ने औरत तक को वस्तु बना दिया है जिसे बाई वन गेट वन की शैली में खरीदा जा सकता है। या फिर बाजार आपको विवश कर सकता है आप रोटी का एक टुकड़ा पाते ही दूसरे के लालच में स्वयं को बेचने को तैयार हो जाएं। और आलोकी यह सिलसिला एक अंतहीन सिलसिला हैं, जो आलोकी के निरर्थक होने के बाद वीणा से आरंभ होता है। 

पर क्या वंचित इतना विवश है। क्या निठारी जैसा कैंसर हमारे समाज को संपूर्ण नष्ट करने की ताकत से सम्पन्न है? क्या कहानी आलोकी तक आकर समाप्त हो जाती है? ऐसा नहीं है। हरिसुमन बिष्ट ने सुखांत देने का प्रयत्न नहीं किया है परंतु विवशता एवं अवसाद के स्थान पर संघर्ष की चेतना देने का प्रयत्न किया है। वीण एक तेज स्वर है, चाहे कुछ बुझा-सा ही हो। वह स्वर गूंजता है। मां के अंगार भरे उलाहनों को सुनने और विवशता के वाक्यों से भरी पोथी को पढ़ने से वीणा इंकार कर देती है। मां अपनी बेटी को डराती है- अगर अधिक जबान चलाई तोे मुंह नुचवा दूंगी सहाब से- एक बार देखा आई थी वहां - तेरी जैसी बीसियों की बोटी-बोटी काट कर फेंक सकते हैं नाले में।’। पर वीणा? वह बिफर उठती है- मैं तुम्हारी बातों पर नहीं आउंगी। तुम मुझे डरा रही हो ।‘‘ और पूरे मोहल्ले में एक जलजला आ जाता है। पर इस जलजले को पुलिस पकड़कर ले जाती है। विवश आलोकी कहती है- ये निठारी के लोग ऐसा ही करते हैं।’’ आलोकी का यही कथन अंततः पाठक के मन में सवाल खड़ा करता है कि निठारी के लोग क्या ऐसे ही करते रहेंगे ? क्या ऐसे ही उन्हें करने दिया जाए? क्या आजाद भारत के नागरिक, जिन्हें संविधान में अपना स्वच्छंद जीवन जीने का अधिकार था, वे सब नपुंसकों की फौज साबित होगें? क्या जलजला ऐसे ही निस्तेज हो जाएगा?क्या मुस्तफा जैसा भयाक्रांत भय की मौत ही मरेगा ? क्या बसेरे को बसेरा नहीं मिलेगा? 

लेखक ने एक सच से हमारा समाना कराया है ओर ये दीगर बात है कि हम सच की ओर पीठ करते हैं या फिर...।