Dr Harisuman Bisht. Hindi Writer

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The Saga of a Mountain Girl | Book Review

By Dr Suwarn Rawat

डॉ. हरिसुमंन बिष्ट  का "The Saga of Mountain Girl" उपन्यास को पढ़ते हुए मिर्च के सौदे से अचानक मैं ठिठक गया। मिर्च के इस दृश्य ने 33 साल पहले,1987 में चुन्नीलाल की कहानी व केतन मेहता के निर्देशन में बनी फीचर फ़िल्म "मिर्च मसाला" की याद ताज़ा कर दी। जिसमें सोनाबाई (स्मिता पाटिल) एवं कॉलक्टर (नसीरुद्दीन शाह) की जगह आछरी व तुलसा की  टकराहट दिखाई गई है। मसाला कारखाने का चौकीदार (ओमपुरी) का चरित्र गोदना के काफ़ी क़रीब है। जो गांव वालों के साथ मिलकर आछरी की मदद करता है। उपन्यास के कुछ अन्य चरित्र भी फ़िल्म के दूसरे चरित्रों के इर्द-गिर्द हैं, जिन्हें राजबब्बर, पारेश रावल, बेन्जामिन गिलानी, मोहन गोखले, दीना, रत्ना, सुप्रिया आदि जैसे प्रतिष्टित सशक्त कलाकारों ने निभाया है।

उपन्यास का  नाट्य रूपांतरण व प्रस्तुतिकरण, आछरी के  निजी जीवन की जटिलताओं के साथ शिल्प की नवीनता व तकनीक कौशल के अनुरूप लगा।

मेरा मानना है कि पहाड़ की पृष्ठभूमि में लिखे गए किसी भी कहानी-उपन्यास के लिए ज़रूरी नहीं कि साहित्यकार की वह कृति सिर्फ़ प्रादेशिक भाषा/बोली में ही ज़्यादा प्रभाव छोड़ती है। ज़रूरी है तो आम लोगों की नब्ज़  टटोला। जो कि इस उपन्यास में है। अंग्रेज़ी में 'हुड़किया बौल' जैसी लोक विधा को बख़ूबी समझा जा सकता  है।

उपन्यास की नायिका आछरी को अनेक स्तरों के संघर्ष से जूझना पड़ता है। शुरुआती बच्चपन के दिनों में घर-परिवार के बीच पिता के बेटा-बेटी के प्रति भेद-भाव पूर्ण रवैये से होती है।उसके बाद डूंगरपुर गाँव के अंदर व बाहर, समान्तर दो पटरियों पर संघर्ष के अन्तर्द्वन्द्व से कहानी दर्शकों को बराबर बांधे रखती है। एक ओर तुलसा व जयदत्त की मिली भगत से तो दूसरी ओर गाँव से बाहर जंगल में जानवरों के इर्द-गिर्द - बाघ के आतंक से शेरू कुत्ते एवं चाँदनी गाय जैसी घटनाएं ।

उपन्यास के चरम में आछरी के बेटे मोहना के जूनजुनाली नृतकी से बढ़ते रिश्तों के बारूदी धुवें से डूँगरपुर गांव में हड़कम्प मच जाता है।

शहरी से बी.डी.ओ., पटवारी, क़ानूनगो आदि मुलाज़िमों का आना और तुलसा का "अतिथि देवो भव:" की तर्ज़ पर उनकी मेहमान नवाज़ी का एक अलग रंग देखने को मिलता है।

चकमक पत्थर, तम्बाकू कोयला, टार्च, लालटैन, पैट्रोमैक्स आदि का रोशनी के अनेक आयाम भी देखने को मिलते हैं।

शंख-घंटी की ध्वनि के अतिरिक्त, जून जुनाली के घुंघरू की छम-छम व मोहना की बांसुरी की मीठी गूँज, गेलू-लीलू के हारमोनियम के सुर व ढोलक के ताल से उपजे महफिले-नृत्य को देखने पूरा गाँव अपने-अपने साजो-सामान के साथ उमड़ पड़ता है।

तुलसा व जयदत्त की जोड़ी के तिकड़मबाजी भरे दांव  आछरी पर भारी पड़ते हैं। लेकिन तुलसा को घुटने टेकने पड़े जब उसके घर-परिवार के लोगों का भी साथ नहीं रहा - बिल्कुल रामायण के उस विभीषण की तरह जो रावण के विनाश का कारण बना।

विशन सिंह का किरदार का हरकारा वाला गीत, गाँव मे चिट्ठी-पत्री-तार आदि बांटते हुए अनायास राजेश खन्ना की अभिनीत फ़िल्म के गाने "डाकिया डाक लाया...ख़ुशी का पैगाम..." की याद दिलाता है।

जूनजुनाली व मोहना के बीच अंकुरित प्यार की कहानी  उपन्यास में आज की पीढ़ी की सोच को दर्शाता है। जो समाज के तमाम तरह के बंधनों से कोसों दूर हैं। जिसे आछरी,  माँ  के रुप में बख़ूबी समझती है और सरे आम डंके की चोट में जुंजुनाली के नृत्य-कला की तारीफ़ करते हुए उसे अपने घर मे बहू के रूप में पनाह देती है।

उपन्यास में छोटे चरित्रों के ज़रिए लेखक कटाक्ष करने से भी नहीं चूके हैं। जैसे भिकयासेंन का टोपी-तहमद पहने महोम्मद कसाई। एक टांग  घसीटता चंदन, मोहना-व आछरी के लिए मरहम कि तरह होता है। गोदना की बेटी, जो गांव में अध्यापिका के रूप ने बच्चों के लिए सीख की बयार बनकर आयी थी पर उसे गाँव वालों ने एक सिरे से ही नकार दिया।

इसके अलावा वैद्य, बिजली वाला, पोस्टमॉस्टर का गांव की सड़क, दवा, स्कूल, बिजली को लेकर बातें करना।दरांती लिए चुहलबाजी करती दानु, रौली,मौली, .कोतुहल पैदा करना कि आख़िर मोहना का पिता कौन ? गाँव की घसियारिने का पेड़ के चारों ओर पूजा-पाठ के अलावा कुदाल, कुल्हाड़ी, रस्सी, सूपा, ओखल का क्रिया कलाप के बीच जड़ी-बूटी, हल्दी वाला दूध, शहद, चिलम, हुक्के का तम्बाकू...यह सब आँचलिक पुट देता है।

आछरी के पास शेरू का भाई जैसा साथ था। ऊन व दूध के कारोबार के लिए चंदू, काली, निमैली, चंडी, झरबैल- बछड़ाभेड़-बकरियां व  चांदनी गाय । ज़रूरत पड़ने पर खेत भी बेचे जा सकते हैं।

रामगंगा नदी में जो भी वाक़्या आछरी के साथ हुआ उसको जानबूझकर सीधे-सपाट ढ़ंग से न दिखाकर, आख़िर तक रहस्यमयी बनाए रखा ताकि दर्शक ख़ुद ही अनुमान लगाएं की आख़िर मोहना के पिता कौन हैं ?

अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ और याद करने की कोशिश करता करता हूँ कि बिष्ट जी से पहली बार कब और कहाँ मुलाक़ात हुई। राजेन्द्र भवन का वह प्रेक्षागृह जहाँ 'कला दर्पण' संस्था के बैनर तले श्री मानवेंदेर शाह पर श्री कमान सिंह मखलोगा द्वारा लिखी किताब का विमोचन होने जा रहा था। राज परिवार से आए गण मान्य लोगों के साथ, दीवान सिंह बजेली, चारू तिवारी आदि लोग मंचासीन थे। कार्यक्रम  के बाद पता चला कि चारू जी के  इत्तला करने पर, दर्शक दीर्घा में डॉ.बिष्ट   गुमसुम किसी कोने बैठे निहार कर चुपचाप चले गए।

मुलाकातों का सिलसिला गोष्ठियों की चर्चाओ या  फिर अन्य किताब के विमोचनों में छुटपुट होता रहा।  


9  फरवरी 2019   जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की ओर से नोएडा सिटी सेन्टर , एन. टी. पी. सी. कुछ रोज़ की अभिनय-कार्यशाला के लिए जाना पड़ा तो मुझे ख़्याल हो आया डॉ. साहेब का। उनको फ़ोन किया और वह लेने आ भी गए अपनी गाड़ी से। घर मे जलपान के दौरान ही उन्होंने अपनी कुछ किताबें तोहफ़े के रूप में मुझे दी।

उन्हीं किताबों में ही थी- "The Saga of a MounGirl." जो मैंने उसी रात  पढ़ डाली थी। सुबह होने पर डॉ. बिष्ट  को फ़ोन करके अपनी ताज़ा-तरीन प्रतिक्रिया साझा की। 

"इस वक़्त फ़ोन पर मैं ज़्यादा तो कुछ नही कहूँगा लेकिन यह यो स्पष्ट है कि आप एक बहुत अच्छे पाठक ज़रूर हो।" 

फ़ोन पर उनका जवाब था।

 "यह तो कोई भी कर लेता, जिसको भी आप अपनी कृति पढ़ने को देते।" 

नही ऐसा नहीं है, यही उपन्यास मैने जब मैंने राष्टीय नाट्य विद्यालय के किसी और साथी को पढ़ने को दिया था, तो कई रोज़ बाद उनसे फ़ोन पर उत्सकता वश पूछ बैठा, 

"कैसा लगा मेरा उपन्यास ?"  

"हम्म, अभी तो कुछ ही पन्ने पढ़ पाया हूँ..।" 

मेरा मन बुझ सा गया क्योंकि उनकी तरफ़ से कोई सकारात्मक जवाब नही मिला जिसकी मुझे उम्मीद थी।

"रंगमंचीय सिमिताओं से हटकर इसका बेहतरीन फ़िल्मकान हो सकता है।" 

मैने यह बात डॉ. बिष्ट को बताई।  

"यही बात एक और शख्शियत ने भी कही थी जो अब हमारे बीच नहीं हैं।"

 "कौन ?" मैने जानना चाहा।

  "विद्यासागर नौटियाल।" 

"फ़िल्म तो नहीँ पर हाँ मौक़ा मिलने पर नाटक तो किया ही का सकता है-इस पर।" मैने बात आगे बढ़ाई।

कुछ महीनों बाद उत्तराखंड संस्कृति विभाग की तरफ से सोमेश्वर में एक रंगमंचीय कार्यशाला के लिए मैं अल्मोड़ा तक ही पहुँच पाया था कि तभी  डॉ. बिष्ट का "मंगल" फ़ीचर फ़िल्म के किसी "चरित्र" को अभिनीत करने का फ़ोन आया। इसका 'स्क्रीन प्ले' उन्होंने ही लिखा था शायद इसलिए भी वह मुझे इस प्रोजेक्ट से जोड़ना चाहते हों। उनसे जब मैंने अपनी कार्यशाला का ज़िक़्र किया तो उन्होंने मुझे 'कौसानी' जाने को भी कहा, ख़ास तौर से कवि सुमित्रानंद पंत आश्रम। कार्यशाला के दौरान में गया भी पैदल ही जंगल के पगडंडी के रास्ते। पन्त एवं बच्चन परिवार के आपसी घनिष्ट रिश्तों की कहानी आश्रम में यहां-वहां टंगे मौन चित्रों से बयां हो रही थीं।

फिर किसी  रोज़ उनके साथ श्री विमल जी के घर भी जाना हुआ। देर शाम तक साहित्य, संस्कृति, गीत-संगीत, नृत्य, रंगमंच को लेकर यक़ीनन खूब चर्चाएँ हुईं।

जाने क्यों मन हुआ कि अबकी बार संडे क्लब के बच्चों के साथ 'the saga of a montain girl' किया जाय। अभी तक एनएसडी,टाई के साथ सीधे कोई नाटक नहीं किया। अभी तक कहानियों को ही आधार बना है  'the blue umbrella'-रस्किन बांड, महाबीर रंवालटा कृत खुली आँखों में सपने, तीलू रौतेली- राजेश्वर उनियाल, ताजमहल-बनफूल। इसी कड़ी में मुझे डॉ. बिष्ट  से हिंदी में 'आछरी-माछरी' भी मिल गया।

इसके मंचन का निर्णय लेने का बाद मंच के पीछे के कलाकारों को जोड़ने में डॉ. बिष्ट के  सुझाव बराबर मिलते रहे। स्निग्धा बिष्ट ने नाटक के चरित्रों की वेशभूषा का ज़िम्मा बख़ूबी निभाया। सतेंद्र परिंदया, मनीष, दीपा पंत, अनुज कश्यप, सुमित भारद्वाज ने गीत-संगीत की ज़िम्मेदारी संभाली। श्रीवर्णा रावत ने जुंजुनाली के महफिल-नृत्य की बारीकियों को तराशा एवं जानवरों के अंग-संचालन को  सूराजीत दास ने । राघव प्रकाश मिश्रा प्रकाश परिकल्पना व हरि खोलिया अपनी रूप-सज्जा से कलाकारों को निखारने में क़ामयाब रहे। 

अगस्त 2019 से जनवरी 2020 तक इस पूरे 6 महीने के रंगमंचीय सफ़र की पूरी प्रक्रिया में मोहित जैन व कंचन की सहायता मिली। पात्रों का चयन में सबने मदद की। 

दर्शकों के दिल को वह दृश्य छू गया जब मोहना अपने शेरू को खो जाने के बाद अपनी चांदनी गाय को बाघ से बचाने में घायल ही जाता है। वह तैश में आकर अपने गंडासे उसकी टांग को छिटक देता है। बाघ और हिंसक होकर उसकी तरफ़ बढ़ता है। तभी अचानक मोहना को

अपनी कमर में बधी बांसुरी का ख़्याल हो आता है। अब उसके उसके सामने दो विकल्प। वह हिंसा के प्रतीक अपने हत्यार को छोड़, अपनी शांति की प्रतीक बांसुरी से एक मधुर तान छेड़ता है। जिसकी गूंज से हिसंक बाघ मंत्र मुग्ध होकर लौट जाता है-बिना हमला किए।

मेरा मानना है कि आछरी की प्रधानी बनने की यात्रा को को और विस्तार दिया जा सकता था ताकि उसके उस संघर्ष से वह और उभर कर आती। इसके अलावा तीन अछरियों के प्रयोग की जगह अगर एक ही आछरी होती तो शायद आम दर्शक ज़्यादा जुड़ पाता उस चरित्र से। ऐसे ही  मोहना के चरित्र को भी अगर एक ही रखते तो शायद जुंनजुनाली के साथ उसके रिश्तों के रंगों को अलग तरह से उकेरा जा सकता था।

अगर हम मंच शिल्प व तकनीकी के बारे में बात करें तो आछरी व तुलसा के सामाजिक अहुदे को उनके घरों की कम और ज़्यादा ऊंचाई  के ज़रिए दिखाया गया। आछरी अपने संघर्ष की लड़ाई में आख़िर उस ऊंचाई को हासिल कर लेती है।

यह भी एक अजीब इतफ़ाक़ रहा कि नाटक के प्रर्दशन के तुरन्त बाद एक लघु-फ़िल्म को लेकर मुझे 'मानीला' की वादियों में जाने का मौक़ा मिला जहाँ डॉ. बिष्ट नेअपनी कहानी का ताना-बाना बुना था- भोटिया पड़ाव, भिकयासेंण, डूंगरपुर गाँव...। 

इसी उम्मीद के साथ कि जल्दी ही  प्रतिष्टित साहित्यकार डॉ.हरिसुमन बिष्ट के इस उपन्यास का मंचीय सफऱ का अगला पड़ाव दूर दर्शन से कई किश्तों में प्रसारित हो या फिर बड़े पर्दे की कोई फ़ीचर फ़िल्म !

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The Saga of a Mountain  Girl | Book Review